Farmers Make This Mistake – गेहूं की फसल में आखिरी सिचाई का समय सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक होता है। अक्सर देखा गया है कि लगभग 99% किसान इसी चरण में गलती कर बैठते हैं, जिसका सीधा असर दाने के भराव, उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है। कई किसान बालियां निकलने के तुरंत बाद पानी दे देते हैं या फिर दाना पकने के समय जरूरत से ज्यादा सिंचाई कर देते हैं। इससे फसल में गिरावट, रोग और दानों का हल्का रह जाना जैसी समस्याएं सामने आती हैं। सही समय पर और सही मात्रा में दी गई आखिरी सिचाई गेहूं की उपज को कई क्विंटल प्रति एकड़ तक बढ़ा सकती है। इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि किस अवस्था में फसल को पानी की अंतिम जरूरत होती है और किन संकेतों को देखकर किसान को फैसला लेना चाहिए।
गेहूं की आखिरी सिचाई का सही समय क्या है?
गेहूं की फसल में आखिरी सिचाई आमतौर पर दाना बनने की अवस्था यानी दूधिया से आटे जैसी अवस्था के बीच करनी चाहिए। जब बालियों में दाना भरना शुरू हो जाता है और दाने को दबाने पर उसमें से हल्का दूध जैसा रस निकलता है, तब फसल को नमी की आवश्यकता होती है। यदि इस समय खेत में नमी की कमी हो जाए तो दाने पतले और सिकुड़े हुए रह जाते हैं। वहीं बहुत देर से, यानी दाना सख्त होने की अवस्था में सिचाई करने से फसल गिरने और रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है। हल्की मिट्टी वाले खेतों में यह सिचाई थोड़ा पहले करनी चाहिए, जबकि भारी मिट्टी में नमी अधिक समय तक बनी रहती है। मौसम की स्थिति, तापमान और हवा की गति भी इस निर्णय को प्रभावित करती है।
99% किसान कौन सी गलती कर देते हैं?
अधिकतर किसान यह मान लेते हैं कि जितना ज्यादा पानी देंगे, उतनी ज्यादा उपज मिलेगी। यही सबसे बड़ी भूल है। कई बार किसान दाना पकने के बिल्कुल अंतिम चरण में भी पानी दे देते हैं, जिससे फसल देर से पकती है और कटाई में दिक्कत आती है। कुछ किसान बालियां निकलते ही आखिरी सिचाई समझकर पानी दे देते हैं, जबकि उस समय फसल को आगे भी नमी की जरूरत रहती है। जरूरत से ज्यादा पानी देने से खेत में जलभराव हो सकता है, जिससे जड़ें कमजोर हो जाती हैं और उत्पादन घट जाता है। समय का सही आकलन न करना, मिट्टी की नमी की जांच न करना और मौसम को नजरअंदाज करना ही बड़ी गलतियां हैं। इनसे बचकर ही किसान बेहतर और भरपूर उत्पादन पा सकते हैं।
मिट्टी और मौसम का क्या रखें ध्यान?
आखिरी सिचाई का निर्णय लेते समय मिट्टी की बनावट और मौजूदा मौसम को जरूर ध्यान में रखें। रेतीली मिट्टी में नमी जल्दी खत्म हो जाती है, इसलिए वहां समय पर हल्की सिचाई जरूरी होती है। दोमट और भारी मिट्टी में नमी लंबे समय तक रहती है, इसलिए बार-बार पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। यदि तापमान अधिक हो और तेज हवाएं चल रही हों तो खेत की नमी तेजी से कम होती है। ऐसे में फसल पर नजर रखना जरूरी है। बारिश की संभावना हो तो सिचाई टालना बेहतर रहता है। सही योजना बनाकर और खेत की नियमित जांच करके किसान नुकसान से बच सकते हैं।
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अधिक उत्पादन के लिए क्या करें?
बेहतर उत्पादन के लिए जरूरी है कि किसान फसल की प्रत्येक अवस्था को समझें और उसी के अनुसार सिचाई प्रबंधन करें। खेत की नमी जांचने के लिए मिट्टी को हाथ में लेकर उसकी नमी का आकलन करें या सरल उपकरणों का उपयोग करें। सिचाई हमेशा सुबह या शाम के समय करें ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो। संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर निराई-गुड़ाई भी दाना भराव में मदद करते हैं। याद रखें कि आखिरी सिचाई फसल को मजबूती देने के लिए होती है, न कि उसे अधिक पानी से कमजोर करने के लिए। सही समय, सही मात्रा और सही विधि अपनाकर ही गेहूं की भरपूर और गुणवत्तापूर्ण पैदावार प्राप्त की जा सकती है।









